Thursday, June 14, 2018

अभिनंदन पत्र

अरुणोदय की नूतनवेला मे आई तनुजा सुकुमारी है
बरखा पंकज और राजभैयाके स्नेह की राजदुलारी है
दादीजी स्नेह सुमन है बुआ फूपा जी गोदखिलाई है
नानाजी के प्रेम पली मामा मामी ने नेह निहारी है
नन्ही नन्ही सी कलिया कब बडी हुई किलकारी है
जब जन्म हुआ जग मे मानोउसकालक्षमी हरषाई है
कल तक मेरे आंगन में घुटने चल,कब दौड़ लगाई है
आज परिणय की वेला आई सोच सोच हरषाई मैं
जब से कैलाश के घर अंकित संग हुई सगाई है,
उस दिन से मुझे विटिया की,लगने लगी जुदाई है
अरुणोदय से सांझ वेला, रजनी संग हुई विदाई है,
मेरी वेटी बड़ी हुई मेरे घर वाज उठी शहनाई है,
इस पावन परिणय वेला मे आशीषों की वारी है,
मन तृप्त हृदय पुलकित दिनेश देते आज बधाई है,
नाच उठा है मन मयूर निमय संग प्रियंका आई है,
प्रियेश प्रियांशी प्रिंश नयनश वंशु ने सुमन वरसाई है,
सोहम गौरी अंतरा कीर्तब्य देव्यांश ने धूम मचाई है
दशरथ से ससुर ,सास कौशल्या
माई है,
राम  सिया सी सुन्दर जोड़ी,
रब ने आज मिलाई है,
वंदन अभिनंदन है आज,
मेरी कुटिया में समधियाई है,

श्वेत वस्त्र धारणी पदमाशनी माँ शारदे
ज्ञान दान प्यार दे आज्ञान से उबार दे
छोड़ कमलासन एक बार तू धरा पे आ
आजा वीणा वाली माँ विनती है तार दे
1
शब्द वर्ण में जगा राष्ट्र प्रेम वंदना
शुध्द हो माँ वर्तनी  स्वर को निखार दे
साधना को शाक्ति से हमें दिव्य दृष्टि  व जन जन में जगा  के प्यार
प्रीत की फुहार दे
2
प्रशस्ति पत्र में कहीं उलझ मैं जाऊँ माँ
कर्म पथ के रास्ते मेरे तु बुहार दे
ममता भरा तु सबको दुलार कर
आन वान शान हमे शाक्ति का भंडार दे
3
भक्त को माँ भक्ति से सृष्टि को वृष्टि से
सोई हुई चेतना को फिर से संवार दे
भावों की माँ हंस ग्रीव नाव पतवार से
डूबते जहान को अलम्ब व आधार दे
4

तेरे दर से माँ कभी खाली कोई जाये नही
झोली में विद्या बुद्धि यश को तु डार दे
जो हमारी बेटियों के अस्मिता के है लुटेरे
ऐसे पापियों के शीश धड़ से उतार दे
5
विनती लता की ललनाओं को प्यार व नारियों को माँ सम्मान का वरदान दे

मंजुलता जैन

सरस्वती वंदना, हैप्पी मानसून, गमे उदासी,दिल मचल रहा है, आईने से यारी,सूर्य सूर्य है कविता जिन्दा रहती है








Friday, June 8, 2018

चाहत रही दूर दूर

चाहत रही दूर दूर हर बक्त अनचाहा मिलता रहा,
आखों का चैन गया,
दिल का सुकून जाता रहा,
हर बक्त अनचाहा मिलता रहा,
दिल दर्दों से भर गया,
जीवन बरबाद हो रहा,
हर बक्त अनचाहा मिलता रहा,
जुबां खामोश है,
दिल जाने क्या  कह रहा ,
हर बक्त अनचाहा मिलता रहा,
दिल यूँ ही बहलाता रहा,
आशाओं के दीप जलाता रहा ,
हर बक्त अनचाहा मिलता रहा,
चाहत रही दूर दूर,

Wednesday, June 6, 2018

अपनी रचनाएँ

आपको  पसंद आयें  न आये,
यह अलग चीज है,
मेरी रचनाएँ मुझको अजीज हैं,
अपनी अपनी  भाषा अपनी तहजीब है,आपको पसंद आये न आये  ये अलग चीज है,
मन के भावों की  सरिता कभी
काल्पनिक कभी सजीव है,

मेरा हुस्न

मेरा हुस्न वनाम परछाई रे,
फिजा मुझसे ही छाई रे,
फूलों का गजरा सजाया,
अम्बर ने चुनर ओढाई रे,
मेरा हुस्न बना बजाई रे,
काली घटाओ से कजरा चुराया,
चाँद ने विन्दिया पहनाई रे,
मेरा हुस्न बना हरजाई रे,
सोना रूप हृदय में समाया,
ये सोच सोच मुस्काई रे,
मेरा हुस्न बना हरजाई रे ,
चलती हवाओं ने घूंघट उठाया,
सारी कायनात सरमाई रे ,
मेरा हुस्न बनाने हरजाई रे,
सारे जग मे तू है  समाया,
प्रेम का सागर में समय,
एक मैं ही तुझसे पराई रे,
मेरा हुस्न बना हरजाई रे,

ब्रज की भोर

नवप्रभात की देखो लाली छा रही हैं ,
रूनझुन की तान देखो कानो में आ रहीं हैं,
ललिता विशाखा राधा की टोली आ रही है,
सर पे दधि मटकी मथुरा को जा रहीं हैं,
मिल जाय कही मोहन मन मे मना रहीं हैं,
नजर जो आये मोहन नज़रे चुरा रही हैं 🙏

दोहे