Wednesday, May 30, 2018

मेरी सहेली

तू हूरिस्तान की हूर हैं,
तू किसी नजर का नूर है
नूरुन्निशा कहूँ  तुझे,
तू मेरी नज़र का नूर है,
स्नेह और प्रेम भरपूर है,
हर बुराई से दूर है ,
कुछ कर गुजरने का सुदूर है,
पर मंजिल अभी दूर है,
कभी संध्या सी नीरवता,
कभी उषा सी चंचलता,
दामिनी की सहेली है,
पर एक अंजान पहेली है,




🙏🙏🙏

No comments:

Post a Comment